जो सबको अच्छा लगे वह करो
- रामेन्द्र सिंह भदौरिया
- जयपुर, राजस्थान, India
- "भाषा भनित एक नहिं मोरें,सत्य कहहुं लिखि कागज कोरें"
American Mind
शब्द और सुर दो के मिलने से जो बात बनती है,वह सब को समझ मै आती है,और जो बात समझ मै आती है,वह बात बनती भी है,इसी का नाम मन्त्र है,
गुरुवार, मार्च 12, 2009
At Death Place (Hospital)
आज के जमाने में अस्पताल दो तरीकों से कमा रहे है,जन्म में भी और मरण में भी,जन्म से अधिक कमाई मरण में उनकी हो जाती है। जन्म को कोई भी अस्पताल नोर्मल तो करना ही नही चाहता है,जिसे देखो आपरेशन से बच्चा पैदा करने का जिम्मा लिये बैठा है। पत्नी की कराहट नही सुनी जाती है,बहू अस्पताल में चीखें मारे ससुर को पसंद नही है,बहू को दर्द न हो इसके लिये वह डाक्टरों के हाथ जोड रही है,आपरेशन थियेटर से डाक्टर निकलता है और कहता है कि बच्चा आडा है,या तो पैदा होते ही मर जायेगा या फ़िर माता को खतरा है,आपरेशन की जरूरत है,मरने का नाम सुनकर घर वालों के होश खराब हो जाते है,डाक्टर की मन की मुराद पूरी होती है,जहां नोर्मल में मिलते पांच दस हजार वहां आपरेशन के बाद मिलने है पच्चीस से तीस हजार,ऊपर से सम्बन्धियों का खून भी फ़्री में,और नही मिला तो पिछले सम्बन्धियों का रखा खून भी अनाप सनाप भावों में,आपरेशन के बाद भी डाक्टरों ने एक और तरीका निकाला,बच्चे को लेजाकर मशीन में रख दिया,आक्सीजन की कमी है,टेम्प्रेचर सही नही है,आदि के बिल भी तो बनवाने है,इधर आपरेशन के बाद कम से कम सात दिन तो अस्पताल में रखना ही है,अगर लडका पैदा हो गया तो और भी चांदी,मन मांगी इनाम। इसके बाद अगर देखा कि मरीज का सम्बन्धी अकडू है,और अपनी दादागीरी दिखा रहा है,किसी राजनेता की पकड होने का अन्दाज बता रहा है तो बस इशारा नर्स को,इधर बच्चे को नहलाने का साफ़ करने काम डाक्टर और नर्सें कर रहीं है उधर से एक नर्स ने चढने वाली ड्रिप से सीधी हवा पास करदी,हवा जैसे ही सीधी ह्रदय में पहुंची बच्चा तो सुरक्षित जच्चा की राम नाम सत्य,अब बेचारे सम्बन्धी बच्चे को सम्भाले कि जच्चा की मरे शरीर को देखें,डाक्टरों ने फ़ौरन अपना काम किया,दोनो किडनी निकाली,दोनों आंखे निकाली,और अंग जो भी काम आने थे निकाले,और बाकी की बाडी पट्टियां बांध कर जच्चा के सम्बन्धियों को पकडा दी,बच्चे को सम्भालने के चक्कर में लेजाकर अन्तिम संस्कार कर दिया,अधिक से अधिक डाक्टर सैम्पेथी दिखाकर अस्पताल का बिल ही तो नही लेगा,लेकिन पीछे से उसका अस्पताल का आगे के दो सालों का खर्चा आराम से निकल गया।
एक नजारा सरकारी अस्पताल का भी सामने है,एक जले हुये नवयुवक की बाडी अस्पताल में आती है,सबसे पहले इमर्जेंसी में बाडी को पहुंचाया जाता है,पेट का कुछ हिस्सा जला है लेकिन डाक्टर कह रहे है कि नब्बे प्रतिशत जल गया है,फ़ौरन बर्न यूनिट में युवक का शरीर पहुंचाया जाता है,इलाज शुरु किया जाता है। इधर डाक्टरों का आपसी संचार शुरु हो जाता है,मोबाइल से किडनी वाले अस्पताल के डाक्टर को बताया जाता है कि उसके जिस मरीज को किडनी लगेगी उसे तैयार किया जाये,दो तीन दिन बाद किडनी पहुंच जायेगी,दूसरा फ़ोन आंखों के डाक्टर को किया जाता है कि मरीज को तैयार किया जाये,दो तीन दिन में आंखें मिल जायेंगी। इधर जले युवक के मरीज से अनाप सनाप दवाओं को मंगाना चालू किया जाता है,कुछ दवायें दी जातीं है,और कुछ पीछे के रास्ते से उसी मेडिकल स्टोर पर पहुंच जाती हैं,दो दिन जला हुआ युवक बर्न यूनिट में आहें भरता है,उसे नींद का इंजेक्सन दिया जाता है,जिससे वह घर वालों से अपना समाचार नही कह सके,फ़िर रात के दो बजे अचानक डाक्टर अपनी दवाई देकर कहता है कि जले हुये युवक की किडनी फ़ेल हो गयीं है,बचाना मुश्किल है,थोडी देर में युवक को मरा घोषित कर दिया जाता है,और लाश सीधे पोस्टमार्टम के लिये भेज दी जाती है,पोस्टमार्टम करने वाला डाक्टर चाहे गये अंगों को पहले सुरक्षित निकालता है फ़िर बिसरा निकालकर कांच के बर्तन में नमक मिलाकर भरता है,और बाडी के अन्दर रुई आदि भरकर लाश को परिजनों को दे दी जाती है,रोते बिलखते परिजन लाश को लेकर अन्तिम क्रिया के लिये ले जाते है,इधर मन चाही कीमत पर किडनी और आंखे प्राइवेट अस्पताल चलाने वाले डाक्टरों के हवाले कर दी जाती है।
दूसरा नजारे में एक युवक अस्पताल में आता है,वह शहर में दो माह पहिले ही आया है,और जब से आया है उसकी पेशाब में परेशानी होने लगी है,पेशाब में परेशानी का मुख्य कारण वह जहां से आया था,उस शहर में उसने लगातार पानी को साफ़ करने वाली मशीन आर ओ का पानी पिया था,लेकिन इस शहर में उसे आर ओ का पानी नही मिल पाया,और पानी के साथ मिले कारकों ने उसे पेशाब की परेशानी दे दी,डाक्टरों ने चैक किया और सीधे से कह दिया कि इसकी किडनी खराब हो गयीं है,दोनो में से एक भी सही नही है,सीटी स्केन उसी अस्पताल के द्वारा करवायी गयी,मूत्र और खून की जांच भी उसी अस्पताल के द्वारा करवायी गयी,मरीज के रिस्तेदारों को कहा गया कि अमुक अस्पताल में ले कर चले जाओं,वहां डाक्टर फ़ोन कर देता है कि अमुक मरीज का ध्यान रखना गरीब है,जितना हो सके उतना कम पैसा लेना,मरीज के रिस्तेदार डाक्टर को भगवान समझ कर सीधे उसी अस्पताल में ले जाते है,पहले किडनी देने वाले का इन्तजाम होता है,उस युवक की पत्नी सामने आकर अपनी किडनी देने की बात कहती है,दोनो को जीवाणुओं से सुरक्षित कमरे में कुछ दिन के लिये रखा जाता है,उस युवक की बीमारी को जस का तस रखने के लिये स्पेशल पानी की जगह वही बाहर का पानी दिया जाता है,और फ़िर मियां बीबी की एक एक किडनी निकाल कर रख ली जाती है और दोनों को आर ओ का पानी पीकर और अन्य सावधानियां रख कर जीने को कह कर मन चाहा धन ले लिया जाता है,इधर भी कमाई और उधर भी कमाई।
बुधवार, फ़रवरी 04, 2009
कहहु रीछपति सुनु हनुमाना
उपरोक्त चौपाई का अर्थ लेने पर एक कथाकार ज्योति जी ने लिखा है,"विशाल सागर की अपार लम्बाई देख कर सभी वानर शोकाकुल हो एक दूसरे का मुँह ताकने लगे। अंगद, नल, नील तथा अन्य किसी भी सेनापति को समुद्र पार कर के जाने का साहस नहीं हुआ। उन सबको निराश और दुःखी देख कर वृद्ध जाम्बन्त ने कहा, "हे पवनसुत! तुम इस समय चुपचाप क्यों बैठे हो? तुम तो वानरराज सुग्रीव के समान पराक्रमी हो। तेज और बल में तो राम और लक्ष्मण की भी बराबरी कर सकते हो। तुम्हारा वेग और विक्रम पक्षिराज गरुड़ से किसी भी भाँति कम नहीं है जो समुद्र में से बड़े-बड़े सर्पों को निकाल लाता है। इतना अतुल बल और साहस रखते हुये भी तुम समुद्र लाँघ कर जानकी जी तक पहुँचने के लिये तैयार क्यों नहीं होते? तुम्हें तो समुद्र या लंका में मृत्यु का भी भय नहीं है क्योंकि तुम्हें देवराज इन्द्र से यह वर प्राप्त है कि मृत्यु तुम्हारी इच्छा के आधीन होगी। जब तुम चाहोगे, तभी तुम्हारी मृत्यु होगी अन्यथा नहीं। तुम केशरी के क्षेत्रज्ञ और वायुदेव के औरस पुत्र हो, इसीलिये उन्हीं के सदृश तेजस्वी और अबाध गति वाले हो। हम लोगों में तुम ही सबसे अधिक साहसी और शक्तिशाली हो। इसलिये उठो और इस महासागर को लाँघ जाओ। तुम्हीं इन निराश वानरों की चिन्ता को दूर कर सकते हो। मैं जानता हूँ, इस कार्य को केवल तुम और अंगद दो ही व्यक्ति कर सकते हो, पर अंगद अभी बालक है। यदि वह चूक गया और उसकी मृत्यु हो गई तो सब लोग सुग्रीव पर कलंक लगायेंगे और कहेंगे कि अपने राज्य को निष्कंटक बनाने के लिये उसने अपने भतीजे को मरवा डाला। यदि मैं वृद्धावस्था के कारण दुर्बल न हो गया होता तो सबसे पहले मैं समुद्र लाँघता। इसलिये हे वीर! अपनी शक्ति को समझो और समुद्र लाँघने को तत्पर हो जाओ।"
जाम्बवन्त के प्रेरक वचनों को सुन कर हनुमान को अपनी क्षमता और बल पर पूरा विश्वास हो गया। अपनी भुजाओं को तान कर हनुमान ने अपने सशक्त रूप का प्रदर्शन किया और गुरुजनों से बोले, "आपके आशीर्वाद से मैं मेघ से उत्पन्न हुई बिजली की भाँति पलक मारते निराधार आकाश में उड़ जाउँगा। मुझे विश्वास हो गया है कि मैं लंका में जा कर अवश्य विदेहकुमारी के दर्शन करूँगा।" यह कह कर उन्होंने बड़े जोर से गर्जना की जिससे समस्त वानरों के हृदय हर्ष से प्रफुल्लित हो गये। सबसे विदा ले कर हनुमान महेन्द्र पर्वत पर चढ़ गये और मन ही मन समुद्र की गहराई का अनुमान लगाने लगे। ,
लेकिन जो बात सच है वह किसी को पता नही है,उसके लिये पहले महाराज जामबन्त के बारे में जानना पडेगा ।
महाराज जामबन्त के बारे में जो लेख आदि मिलते है वे इस प्रकार से हैं-
एक बार सत्राजित ने भगवान सूर्य की उपासना करके उनसे स्यमन्तक नाम की मणि प्राप्त की। उस मणि का प्रकाश भगवान सूर्य के समान ही था। एक दिन भगवान कृष्ण जब चौसर खेल रहे थे तभी सत्राजित उस मणि को पहन कर उनके पास आया। दूर से उसे आते देख कर यादवों ने कहा, "हे कृष्ण! आपके दर्शनों के लिये साक्षात् सूर्य भगवान या अग्निदेव चले आ रहे हैं।" इस पर श्री कृष्ण हँस कर बोले, "हे यादवों! यह सत्राजित है, उसने सूर्य भगवान से प्राप्त स्यमन्तक मणि को पहन रखा है इसी लिये वह तेजोमय हो रहा है।" उसी समय सत्राजित वहाँ पर आ पहुँचा। सत्राजित को देखकर उन यादवों ने कहा, "अरे सत्राजित! तेरे पास यह अलौकिक दिव्य मणि है। अलौकिक सुन्दर वस्तु का अधिकारी तो राजा होता है। इसलिये तू इस मणि को हमारे राजा उग्रसेन को दे दे।" किन्तु सत्राजित यह बात सुन कर बिना कुछ उत्तर दिये ही वहाँ से उठ कर चला गया। सत्राजित ने स्यमन्तक मणि को अपने घर के एक देव मन्दिर में स्थापित कर दिया। वह मणि नित्य उसे आठ भार सोना देती थी। जिस स्थान में वह मणि होती थी वहाँ के सारे कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते थे।
एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेनजित उस मणि को पहन कर घोड़े पर सवार हो आखेट के लिये गया। वन में प्रसेनजित तथा उसके घोड़े को एक सिंह ने मार डाला और वह मणि छीन ली। उस सिंह को ऋक्षराज जाम्बवन्त ने मारकर वह मणि प्राप्त कर ली और अपनी गुफा में चला गया। जाम्बवन्त ने उस मणि को अपने बालक का खिलौना बना दिया।
जब प्रसेनजित लौट कर नहीं आया तो सत्राजित ने समझा कि मेरे भाई को श्री कृष्ण ने मारकर मणि छीन ली है। श्री कृष्ण जी पर चोरी के सन्देह की बात पूरे द्वारिकापुरी में फैल गई। जब श्री कृष्णचन्द्र ने सुना कि मुझ पर व्यर्थ में चोरी का कलंक लगा है तो वे इस कलंक को धोने के उद्देश्य से नगर के प्रमुख यादवों का साथ ले कर रथ पर सवार हो स्यमन्तक मणि की खोज में निकले। वन में उन्होंने घोड़ा सहित प्रसेनजित को मरा हुआ देखा पर मणि का कहीं अता-पता नहीं था। वहाँ निकट ही सिंह के पंजों के चिन्ह थे। वे सिंह के पदचिन्हों के सहारे आगे बढ़े तो उन्हें सिंह भी मरा हुआ मिला और वहाँ पर रीछ के पैरों के चिन्ह मिले जो कि एक गुफा तक गये थे। जब वे उस भयंकर गुफा के निकट पहुँचे तब श्री कृष्ण ने यादवों से कहा कि तुम लोग यहीं रुको। मैं इस गुफा में प्रवेश कर मणि ले जाने वाले का पता लगाता हूँ। इतना कहकर वे सभी यादवों को गुफा के मुख पर छोड़ कर उस गुफा के भीतर चले गये। वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि उस प्रकाशवान मणि को रीछ का एक बालक लिये हुये खेल रहा है। श्री कृष्ण ने उस मणि को वहाँ से उठा लिया। यह देख कर जाम्बवन्त अत्यन्त क्रोधित होकर श्री कृष्ण को मारने के लिये झपटा। जाम्बवन्त और श्री कृष्ण में भयंकर युद्ध होने लगा।
जब श्री कृष्ण जी गुफा से वापस नहीं लौटे तो सारे यादव उन्हें मरा हुआ समझ कर बारह दिन के उपरान्त वहाँ से द्वारिका पुरी वापस आ गये तथा समस्त वत्तान्त वसुदेव और देवकी से कहा। वसुदेव और देवकी व्याकुल होकर महामाया दुर्गा की उपासना करने लगे। उनकी उपासना से प्रसन्न होकर दुर्गा देवी ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया कि तुम्हारा पुत्र तुम्हें अवश्य मिलेगा।
श्री कृष्ण और जाम्बवन्त दोनों ही पराक्रमी थे। युद्ध करते हुये गुफा में अट्ठाइस दिन व्यतीत हो गये। भगवान श्री कृष्ण की मार से महाबली जाम्बवन्त की नस टूट गई। वह अति व्याकुल हो उठा और अपने स्वामी श्री रामचन्द्र जी का स्मरण करने लगा। जाम्बवन्त के द्वारा श्री राम के स्मरण करते ही भगवान श्री कृष्ण ने श्री रामचन्द्र के रूप में उसे दर्शन दिये। जाम्बवन्त उनके चरणों में गिर गया और बोला, "हे भगवान! अब मैंने जाना कि आपने यदुवंश में अवतार लिया है।" श्री कृष्ण ने कहा, "हे जाम्बवन्त! तुमने मेरे राम अवतार के समय रावण के वध हो जाने के पश्चात् मुझसे युद्ध करने की इच्छा व्यक्त की थी और मैंने तुमसे कहा था कि मैं तुम्हारी इच्छा अपने अगले अवतार में अवश्य पूरी करूँगा। अपना वचन सत्य सिद्ध करने के लिये ही मैंने तुमसे यह युद्ध किया है।" जाम्बवन्त ने भगवान श्री कृष्ण की अनेक प्रकार से स्तुति की और अपनी कन्या जाम्बवन्ती का विवाह उनसे कर दिया।
श्री कृष्ण जाम्बवन्त को साथ लेकर द्वारिका पुरी पहुँचे। उनके वापस आने से द्वारिका पुरी में चहुँ ओर प्रसन्नता व्याप्त हो गई। श्री कृष्ण ने सत्राजित को बुलवाकर उसकी मणि उसे वापस कर दी। सत्राजित अपने द्वारा श्री कृष्ण पर लगाये गये झूठे कलंक के कारण अति लज्जित हुआ और पश्चाताप करने लगा। प्रायश्चित के रूप में उसने अपनी कन्या सत्यभामा का विवाह श्री कृष्ण के साथ कर दिया और वह मणि भी उन्हें दहेज में दे दी। किन्तु शरनागत वत्सल श्री कृष्ण ने उस मणि को स्वीकार न करके पुनः सत्राजित को वापस कर दिया।
रविवार, जनवरी 25, 2009
लोला और लल्ली
अमेरिका के निवासी भारत की तरह से मूलधारा चक्र की अपेक्षा छठे चक्र पर अधिक ध्यान रखते है,उन्हे स्त्री है तो पुरुषों की जानवरों जैसी चाल ढाल,और पुरुष है तो स्त्रियों की पुट्ठों की ऊपर नीचे की चाल पसंद है। वे राह चलते किसी को भी किसी भी प्रकार से छेड सकते है,किसी भी प्रकार की शारीरिक हरकत कर सकते है,कोई बुरा नहीं मानता है,सभी को एक दूसरे को छेडना मस्ती करना अच्छा लगता है। विकास की पुत्रियों के साथ भी ऐसा ही था,वे भी उसी रंग ढंग में ढल गयीं थी,और उन्हे भी किसी की कोई बात बुरी नही लगती थी।
विकास की पत्नी को अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये काम करना पडता था,और विकास भी काम के कारण फ़ुरसत में नही होता था,वह लडकियों को केवल स्कूल जाने और रात को उसके काम से आने के बाद हाय हैलो के अलावा और कोई बात नही हो पाती थी,उसको काम की टेंसन और रहने खाने पीने और आने जाने के साधनों के लिये कमाना बहुत जरूरी था,इसी चिन्ता और कमाई के चक्कर में वह अपने को भी भूल गया था,उसने रात को अधिक से अधिक शराब पीना चालू कर दिया था,विकास की पत्नी को इसलिये कोई फ़र्क नही पडता था क्यों कि उसके काम करने वाले स्थान पर भी उसके चाहने वाले पैदा हो गये थे,वे काम के साथ उसे खाने पीने का सामान भी देते थे,और शरीर के सुख से भी उसे दुखी नही होने देते थे,विकास की पत्नी को विकास से और विकास को अपनी पत्नी से केवल घर में रहने और अमेरिकी कानून से केवल पति पत्नी की हैसियत से रहने का ही सुख था,बाकी का तो केवल खानापूरी ही माना जा सकता है,उसकी लडकियां भी बडी होती जा रहीं थी,और उनके अन्दर भी खाने पीने और पढाई के अलावा शारीरिक सुख की कामना होने लगी थी।
भारत या अन्य देश से अमेरिका में काम करने के लिये जाने वाले वहां पर स्थाई निवास का जरिया ढूढते है,और स्थाई निवास के लिये वहां पर पहले किसी स्थाई रहने वाले भारतीय या अन्य देश के व्यक्ति से शादी करते है,इस तरह से उनका स्थाई रहने का बंदोबस्त हो जाता है,शादी करने के बाद जब उनका निवास स्थाई हो जाता है तो किसी न किसी प्रकार का बहाना या पारिवारिक कारण बनाने के बाद अमेरिकी कानून के हिसाब से तलाक ले लिया जाता है,और जिसके साथ शादी की गयी होती है,उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताणित होने से कोई ताल्लुक नहीं रखा जाता है,अगर शादी करने वाला अच्छा कमाता है तो उसके साथ मामूली सी सिम्पेथी रखी जाती है,नही तो उसे केवल अपने माता पिता के सहारे के अलावा और कोई रास्ता नही रहता है।
यही हाल विकास के साथ हुआ,उसकी लडकियां भी भारतीयों के चक्कर में फ़ंस गयीं,पहली के साथ तो बहुत अच्छी तरह से मेल मुलाकात करने के बाद शादी की गयी,उसके एक बच्चा भी हो गया,और पति पत्नी की मामूली सी कहासुनी के बाद तलाक हो गया,दूसरी के साथ भी एक भारतीय मूल के निवासी ने अपना पासा फ़ेंक कर उसे अपने जाल में फ़ंसा लिया,चूंकि विकास और उसकी पत्नी ने उसे समझाने और पहली लडकी के बारे में समझाया लेकिन दोनों के बारे में लडकियां भी जानती थीं,कि उनके माता पिता का आपस में क्या हाल है,इसलिये वे भी सीधी तरह से अपने पिता विकास से कहती है उन्हे अपने हिसाब से सोचने और जो वे करती है वह करने दो,अब विकास को अपना पिछला जीवन याद आता है,अगर वह अपनी पत्नी को अपने माता पिता और अपने देश की सीमा में रखता तो उसका जीवन मात्र कुछ धन के कारण बरबाद नहीं होता,उसकी अपनी संतान जिसके लिये वह इतनी दूर आकर बसा,घर छोडा,अपना देश छोडा वह सब इस धन के कारण हुआ,अपने लोले पन को अगर वह नही अपनाता,और अपनी पत्नी के अलावा और किसी को नही देखता,जितनी कमाई थी उसके अनुसार ही खर्च करता तो उसकी पत्नी को भारतीय पत्नी की तरह से कमाने के लिये बाहर नही जाना पडता और वह अन्य व्यभिचारियों के चक्कर में नही पडती,उसकी लल्ली बरबाद नही होती,तो उसकी लडकियों पर भी मां का असर नहीं पडता। उसने जो कमाया और जो खाया उसे कोई नही देखेगा,उसने जो संतान पैदा की उसे सभी देखेंगे,संतान ही व्यक्ति के द्वारा पैदा की गयी सच्ची कमाई है,धन तो आज है कल नही है,और कल बहुत हो जायेगा,लेकिन संतान हमेशा नही है,अगर वह खराब हो गयी तो जीवन ही बेकार है,संस्कृत में सुभाषितानि नामक पद्य में एक श्लोक है:-"येषां न विद्या न तपो न दानं,ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्म:,ते मृत्यु लोके भुवि भारभूत:,मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति",अर्थात न तो यश है,न दान है,न तप है,और न ही ज्ञान है,न शील है, न गुण है,न धर्म है,जब यह सब नही है तो मनुष्य हिरण की तरह से इस पृथ्वी पर भार रूप में विचरण करने के बाद चरते फ़िरते है।
देशी गदहा पूर्वी रेंक
गदहे तो जुगाली में लग गये,लेकिन गदहियां अपने अपने मन में बिचलित होने लगीं,जब यह गदहा अजीब सा बोलता है तो इसकी दिनचर्या भी अजीब ही होगी,यह अजीब सा ही खाता होगा,अजीब सा ही घूमता होगा,देखने में कैसा "हैंडसम" दिखता है,आदि विचार गदहियां अपने अपने मन में लाने लगीं,और अपने अपने मालिक की राह देखने लगीं कि कब उनके पैरों में बंधा "पैंड" खोला जाये और वे स्वतंत्र होकर उस गदहे के पास जाकर उससे और कुछ बात चीत करने के बाद उसके बारे में पता कर सकें।
सुबह के होते ही सभी गदहों और गदहियों के मालिक आये और अपने अपने गदहे और गदहियों के पैरों में रस्सी से बंधे पैड खोल दिये,कोई गदहा पानी की तरफ़ भागा,कोई सूखी घास की तरफ़ भागा,और कोई शरीर की जकडन को खोलने के लिये लम्बी लम्बी छलांग लगाता हुआ मैदान की तरफ़ दौडने लगा,लेकिन सभी गदहियां उस गदहे को खोजने में लग गयीं,जिसने सबसे अलग तरीके से रैंका था।
वह गदहा अच्छे अच्छे गुर जानता था सो चुपके से एक बगीचे के बीच में घने पेडों के बीच जाकर छुपकर खडा हो गया,सभी गदहियां उसे खोजने के लिये बिचलित होने लगीं,और अपने अपने तरीके से उसे ढूंढने के लिये अपने अपने उपाय अंजवाने लगीं,एक गदहिया बहुत चालाक थी,उसे शब्द स्पर्श और गंध का अच्छा ज्ञान था,अक्सर जानवर इन्ही तीन कारणों से अपने अपने साथियों को खोजा करते है,किसी जानवर में इन तीन कारणों का अच्छा ज्ञान होता है तो किसी जानवर में कम होता है,उस गदहिया ने अपने ज्ञान से उस अजीब रैंकने वाले गदहे को चुपचाप जाकर खोज लिया,वह गदहा बडी शान से अपने को और अधिक जवान दिखाने के लिये और दूसरे गदहों से कद्दावर दिखने के लिये अपने आगे के दो पैरों को ऊंची जगह पर रख कर आराम से कान ऊपर करके खडा था,गदहिया ने देखा तो पहली ही नजर में उस गदहे पर लट्टू हो गयी,क्या शानदार शरीर है,एक दम छरकीला,सीना कितना जोडदार है,पीछे का भाग जो आगे के पैर ऊंचे स्थान पर होने के कारण अधिक उत्तेजित दिखाई दे रहा था,उस गदहिया को एक दम से भा गया।
वह धीरे धीरे उस गदहे के पास गयी,और एक तरफ़ जाकर हरी घास को अपनी पूंछ को जल्दी जल्दी से हिलाकर खाने लगी,उसकी एक आंख गदहे पर थी,उसकी सोच में था कि अन्य गदहों की तरह से वह गदहा भी उसके पास आयेगा और वह अपनी दुलत्ती से पहले उसका स्वागत करेगी,लेकिन वह अजीब सी रैंकने वाला गदहा भी कम चालाक नही था,वह आराम से से अपने स्थान पर खडा रहा और अपने दोनो कानों को स्टेप बाई स्टेप ऊपर नीचे करने लगा,कभी अपनी ताकत को और अधिक दिखाने के लिये वह अपने आगे के दोनो पैरों से जमीन को पीछे की तरफ़ खुरचता और कभी अपनी पीछे की दुलत्ती को हवा में फ़ेंकता,गदहिया को अजीब सा लग रहा था,वह सोच रही थी कि वह उसके पास आकर प्यार का इजहार करेगा तो वह उसको अपनी दुलत्ती से दुलारेगी,लेकिन वहाँ तो नजारा ही अलग था,आखिर गदहिया का सब्र टूटने लगा,और उसने अपने मन में ठाना कि इस अजीब गदहे को मजा जरूर चखाना है।
वह धीरे धीरे से उस गदहे के पास गयी,पहले आगे गयी फ़िर पीछे गयी और चारों तरफ़ से उसे देखा,उस गदहे ने भी उसे तिरछी नजरों से आगे पीछे से देखा,उसकी नजर में भी वह भा गयी,काफ़ी कमशिन थी,खाये पिये मालिक के घर की थी,दोनों में इशारों इशारों में बातें हुयीं,अपने अपने ठिकाने का पता एक दूसरे को दिया,एक दूसरे के रहन सहन का पता किया,खानपान का पता किया,लेकिन गदहिया और गदहे के खानपान में समानता नही थी,गदहिया तो देशी घास को खाती थी,लेकिन गदहा इम्पोर्टेड घास को खाता था,गदहिया के मन में भी इम्पोर्टेड घास को चखने का मन आया,गदहे ने अपने रहने का पता बता दिया और वह अजीब सी चाल चलता हुआ चला गया,उसने दूसरे गदहों की तरह पहली ही बार में अपनी ताकत को नहीं अंजवाया था,वह आराम से अपना काम चलाने का गुर जानता था।
गदहिया ने दूसरे दिन मालिक का पैंड खुलते ही उस गदहे के निवास की तरफ़ का रुख किया,और समय पर उस गदहे के पास जा पहुंची,गदहा बडे अनौखे अन्दाज से इम्पोर्टेड घास को कुतर कुतर कर खा रहा था,बाकी के गदहे तो घास को चरते है वह घास को तरीके से सजाकर खा रहा था,उसने घास के डंठलों को एक तरफ़ रखा था,पत्तियों को एक तरफ़ रखा था,घास के साथ मालिक द्वारा दिये गये रातब को वह एक तरफ़ रखे था,पहले वह घास के डंठल को काटता फ़िर पत्तियों को मुंह में देता और मसाले की तरह से रातब को जीभ लगाकर चख लेता,गदहिया उसके खाने के अंदाज से बहुत प्रभावित हुयी,हर अंदाज ही निराला था,बोली का अंदाज अलग,खाने का अंदाज अलग,मिलने पर किया जाने वाला व्यवहार अलग,वाह ! क्या गदहा है,उसने गदहे के निमंत्रण पर घास को उसी के अंदाज से खाने की कोशिश की लेकिन जिस तरह से उसने पहले घास को चरा था,उस तरह से नही खाने के कारण उसका अंदाज कभी कभी उस गदहे से अलग हो जाता था,इसलिये गदहा मुस्करा देता था,उसके मुस्कराने के अंदाज से गदहिया कुछ झेंप सी जाती,लेकिन नया प्राप्त करने की चाहत में वह अपने इस भाव को भी नहीं प्रकट कर सकती थी,अन्य कोई गदहा होता तो कभी की उसने दुलत्ती झाड दी होती।
गदहे ने उसे आराम से घास खिलाकर,मौज मस्ती की बातें इशारों में करनी चालू कर दीं,गदही को भी रस आने लगा,वह मुस्कराकर और अपनी कमसिन अदा को दिखा दिखाकर गदहे से बातें करने लगी,दोनों की बातें चलती रहतीं,इतने में ही गदहे का मालिक आया,और उसे अपने इशारे से बुलाया,वह अपने मालिक के पास गया और मालिक ने उसके कान में कुछ कहा,और चला गया,गदहा भी अपने घास वाले स्थान पर आया,और पहले की तरह से गदहिया से बातें करने लगा,गदहिया ने पूंछा कि मालिक कान में क्या कह कर गया है,और दूसरे गदहों के मालिक तो पहले एक मुदगर पुट्ठे पर जमाते है,फ़िर पकड कर ले जाते है,और मनचाहा बोझ लाद कर जहां मर्जी होती है ले जाते है। उस गदहे ने कहा कि उसका काम अजीब है,और इस अजीब काम की बजह से ही उसे इम्पोर्टेड घास खाने को मिलती है,और कोई वजन आदि नही लादना पडता है,उसका मालिक उसे जब किसी अन्य को बेचता है तो वह दूसरे मालिक के पास जाकर कुछ दिन तो वहां पर रहता है,और मौका देखकर एक दिन फ़रार होकर अपने इस मालिक के पास वापस आजाता है,इस तरह से मालिक को लाखों का फ़ायदा पहुंचाने की एवज में उसका मालिक उसका बहुत अच्छा ख्याल रखता है,और मनचाही इच्छा को पूरा करता है,गदहिया से गदहा ने कहा कि अगर उसकी भी इच्छा उसके साथ रहने की है तो उसके जैसा ही काम करने के लिये अपने मालिक के घर से फ़रार होकर आजाये और बडे आराम से उसके साथ रहे।
गदहिया ने सोचा कि बात बहुत अच्छी है,न कोई मेहनत और न किसी अन्जान गदहे का डर,वह अपने मालिक के घर पर शाम को गयी और रात को अपने पैडे को चबाकर खोल लिया और उस गदहे के पास जा पहुंची,गदहे के मालिक ने देखा कि मजबूत शरीर की सुन्दर गदही उसके पास आयी है,वह अपने गदहे और गदही को लेकर ट्रक से दूसरे शहर को रवाना हो गया,अब दोनो गदहे और गदही मिलकर मालिक के साथ मल्टीनेशन वाला काम कर रहे है,वे दोनो गदहों को बेचने के बाद फ़रार होकर आने की शिक्षा देते है,और मालिक को करोंडों का मालिक बनाकर मजे से इम्पोर्टेड घास खाते है,मजे की जिन्दगी है,न वजन ढोने का दुख,न मालिक के मुदगर का डर,और न ही आवारा गदहों और गदहियों का संग।
शनिवार, जनवरी 24, 2009
American Mind-2
शुक्रवार, जनवरी 23, 2009
बचना कहीं मीडिया न धर ले !
गुरुवार, जनवरी 22, 2009
American Mind if Ruler in House of Communication
You enjoy passing on the knowledge you have gained. Although you are
probably very open to new ideas, there yet may be the desire for
scientific proof before anything can be believed. Your mind enjoys
creating and it is thorough and self-reliant. Pride and intellectual
domination may be something you need to work on, especially
intellectual pride. Patience may also need developing.
Misunderstandings can occur with siblings or neighbors due to your
belief that you are always or mostly right. You have a strong desire
to learn and this may take you on many short journeys. You need to
communicate and there may be writing or speaking ability.
American Mind If Ruler in house of Money
for power through personal possessions, talents and money may engage
your energies. Money comes and goes easily. You are generous and
ambitious, but can be extravagant and grasping. You must watch a
tendency to be possessive of or "lord over" people and things. If the
Sun is afflicted by aspect, perhaps you do not feel loved or feel
worthy of love.
